प्रधानाचार्य का संदेश

प्राचार्य की कलम से

    शिक्षा का अपना अलग मूल्य है एवं शिक्षा स्वयं में एक पुरस्कार है.शिक्षा के सटीक निहितार्थ तलाशने  की चाह में युग बीत गए एवं सदियाँ गुजर गयी लेकिन यह अभी सतत जारी है क्योंकि इसका निहितार्थ गतिमान है एवं निरंतर परिवर्तनशील लोग, स्थान एवं समय के चतुर्दिक बुना हुआ है .

 शिक्षा इच्छित की प्राप्ति का एक मात्र माध्यम है. यह जीवन की चुनौतियों का सामना करने  हेतु श्रेष्ठ अन्तर्निहित क्षमताओं से सुसज्जित करती है; जीवन के श्रेष्ठ आनंद की अनुभूति का साधन सुझाती है; मानव में देवत्व की अनुभूति के योग्य बनाती है;प्रकृति में अज्ञात शक्ति होने की अनुभूति के लिए प्रेरित करती है;अग्राह्य को ग्राह्य बनाने का आवाहन करती है;जिसे कोई बांटना नहीं चाहता उसे बाटने  के लिए प्रेरित करती है.

 शिक्षा,व्यक्ति जहां भी जाए, वहां उसे आदर पाने के योग्य बनाती है. अधोलिखित श्लोक में यह स्पष्टतया व्याख्यायित है:

 

  विद्वत्वं च न्रिपत्वं  च नैवं तुल्य कदाचन  

  स्वदेशे पूज्यते  राजा  विद्वान सर्वत्र पूजयेत.

   हम लोग  प्रयास क्यों  नहीं कर सकते?